कुंडली के छठे भाव का महत्व
षष्ठ भाव से गोद जाना, विपरीत राजयोग चोट, रोग, चोरी हो जाना, हिंसा आदि का विचार किया जाता है।
1. परत्व तथा अन्यत्व – छठा भाव शत्रु स्थान कहलाता है। शत्रु निज हित की हानि करता है, अतः वह अपना नहीं, पराया कहलाता है। इस हेतु दूसरों, अन्यों, म्लेच्छों इतर जाति, विदेशी आदि व्यक्तियों तथा वस्तुओं का विचार छठे भाव से किया जाता है।
छठे भाव का विचार इस सन्दर्भ में करते समय ग्यारहवें भाव का विचार भी साथ ही साथ कर लेना चाहिए, क्योंकि ग्यारहवां स्थान छठे से छठा होने के कारण, ‘भावत् भावम्’ के नियमानुसार अपने में छठे भाव के गुण-दोष भी रखता है।
इन दो भावों के अतिरिक्त ग्रहों में राहु जात्यन्तर का द्योतक है, अतः अन्यत्व (Foreignness) का विचार करते समय राहु का विचार भी आवश्यक है।
जैसे किसी कुण्डली में द्वितीय भाव तथा उसके स्वामी पर षष्ठाधिपति, एकादशाधिपति तथा राहु, इन तीनों ग्रहों का युति अथवा दृष्टि द्वारा प्रभाव पड़ रहा हो तो उस मनुष्य का कुटुम्ब (द्वितीय स्थान) अन्य हो जाता है, दूसरे शब्दों में वह व्यक्ति गोद ले लिया जाता है। इसी प्रकार सर्वत्र अन्यत्व (Foreignness) का विचार कर लेना चाहिए ।
2. चोट का योग – शत्रु अथवा बाधा का पहला काम चोट पहुंचाना है। अतः छठे स्थान से चोट, घाव, आदि का विचार किया जाता है जो रोगरूप है । षष्ठेश और एकादशेश, दोनों का काम चोट अथवा क्षति पहुंचाना है ।
ग्रहों में मंगल चोट पहुंचाने वाला हिंसात्मक ग्रह है जब स्वयं मंगल ही षष्ठ तथा एकादश, दोनों का स्वामी बन जाए, जैसे कि मिथुन लग्न वालों के लिए होता है तो यह मंगल अपनी स्थिति आदि से प्रभावित अंगों पर चोट आदि लगाता है, जैसे मिथुन लग्न में स्थित मंगल सिर में चोट देता है।
इसी प्रकार मिथुन लग्न वालों की कुण्डली में मंगल यदि अष्टम भाव, शनि तथा लग्नेश तीनों को अपनी युति अथवा दृष्टि द्वारा पीड़ित करता हो तो मनुष्य की मृत्यु चोट लगने से होगी, क्योंकि मृत्यु के कारण को दर्शाने वाले अंगों, जैसे अष्टम भाव, अष्टमेश तथा लग्नेश सभी पर मंगल का क्षतिदायक प्रभाव पड़ता है।
3. रोग कारक – जैसा कि ऊपर दर्शाया जा चुका है छठा भाव रोग का है। उधर शनि और राहु दो ग्रह रोग कारक (Significators of Disease) माने गए हैं। अतः स्पष्ट है कि
यदि किसी कुण्डली में राहु षष्ठ स्थान में, शनि की राशि में स्थित हो तो शनि तीन प्रकार से रोग देने वाला बन जाएगा-
- रोग कारक होने से,
- रोग स्थान का स्वामी होने से,
- राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी होने से।
ऐसा शनि जिस भाव में स्थित होगा अथवा जिस भाव पर दृष्टि डालेगा उसमें रोग की उत्पत्ति कर देगा।
उदाहरणार्थ कन्या लग्न हो और राहु छठे स्थान में हो तो शनि उपर्युक्त तीनों प्रकार से रोगदायक होगा। यह शनि यदि नवम स्थान में पड़ जाए तो रीढ़ की हड्डी, नितम्ब आदि नवम स्थान प्रदर्शित शरीर के अंगों में दोष तथा रोग उत्पन्न करेगा । अपनी तृतीय स्थान तथा एकादश स्थान पर दृष्टि के कारण कान के रोग भी ला खड़े करेगा । छठे स्थान पर दृष्टि के कारण अन्तड़ियों को भी निर्बल बनाएगा ।
4. ऋणकारक – कर्ज अथवा ऋण भी हम दूसरों से अन्यों से लेते हैं, अपनों से नहीं; क्योंकि अपने देकर लेते नहीं । अतः ऋण का सम्बन्ध भी छठे स्थान से है।
जब लग्न, द्वितीय तथा द्वादश पाप प्रभाव में हों और षष्ठेश का सम्बन्ध दूसरे भाव तथा उसके स्वामी से हो तो मनुष्य की आय कम, व्यय ज्यादा होकर, ऋण की उत्पत्ति होती है।
5. विपरीत राजयोग – राजयोग दो प्रकार का होता है – राजयोग तथा विपरीत राजयोग।
सामान्य राजयोग तब बनता है जब शुभ घरों के स्वामियों का परस्पर सम्बन्ध होता है और सम्बन्ध करने वाले ग्रह बलवान होते हैं।
परन्तु विपरीत राजयोग इसके विरुद्ध तब बनता है जब अशुभ घरों के स्वामियों का परस्पर सम्बन्ध होता है और सम्बन्ध करने वाले ग्रह निर्बल होते हैं।
विपरीत राजयोग का फल अतीव शुभ माना जाता है; कारण कि कुण्डली में दो प्रकार के घरों का अस्तित्व है – एक भावात्मक; दूसरा अभावात्मक (Negative) ।
जब अभावात्मक घर निर्बल हो तो अभाव का नाश होता है अर्थात् ऋण, दरिद्रता, अल्पता का नाश होता है: जिसका अर्थ यह है कि मनुष्य सम्पन्न, श्रीमान् तथा सब सुख सामग्री से युक्त होता है । परन्तु भावात्मक शुभता बनी रहती है। अतः विपरीत राजयोग वाला सामान्य योग वाले की अपेक्षा अधिक धनी तथा सुखी होगा।
उदाहरणार्थ कर्क लग्न बुध पंचम स्थान में तथा शनि अष्टम में हो तो बुध विपरीत राजयोग बनाता है; क्योंकि बुध तृतीय भाव से तृतीय भाव तथा द्वादश भाव दोनों अशुभ भावों को निर्बल बनाता है । पुनः उस पर अष्टमाधिपति शनि की दृष्टि उसको और अधिक निर्बल करती है। फल यह होता है कि द्वादश तथा तृतीय भावों की अनिष्टता नष्ट होकर महान धन की प्राप्ति होती है।
इसी प्रकार यदि मेष लग्न हो और बुध अष्टम भाव में हो तथा शनि द्वारा दृष्ट हो तो भी विपरीत राजयोग बनता है; क्योंकि दो अशुभ स्थानों का स्वामी बुध नाश स्थान में पापी शनि द्वारा दृष्ट होने पर उन अशुभ स्थानों की अशुभता का नाश करता हुआ महान् सुख तथा धन की सृष्टि करता है। परन्तु दोनों उदाहरणों में बुध पर शुभ प्रभाव नहीं होना चाहिए ।
6. मामा के सम्बन्ध में – छठा स्थान चतुर्थ से तृतीय होने के कारण माता के छोटे भाई का स्थान बनता है। अतः मामा का विचार छठे भाव तथा मामा के कारक बुध ग्रह द्वारा करना चाहिए ।

नमस्कार । मेरा नाम अजय शर्मा है। मैं इस ब्लाग का लेखक और ज्योतिष विशेषज्ञ हूँ । अगर आप अपनी जन्मपत्री मुझे दिखाना चाहते हैं या कोई परामर्श चाहते है तो मुझे मेरे मोबाईल नम्बर (+91) 7234 92 3855 पर सम्पर्क कर सकते हैं। धन्यवाद ।
7. चोरी का योग – मिथुन लग्न वालों के लिए तो मंगल और भी अधिक चोर का प्रतिनिधि हो जाता है। एक तो मंगल स्वयं चोर कारक है, दूसरे यह लग्न से चौर्य स्थान (छठे भाव) का स्वामी बन जाता है। तीसरे, यह एक अन्य चौर्य स्थान अर्थात् एकादश स्थान का भी स्वामी बन जाता है (एकादश भाव छठे से छठा होने के कारण, ‘भावात् भावम्’ के सिद्धान्तानुसार छठे जैसा कार्य करता है)।
अतः मिथुन लग्न की कुण्डली में मंगल यदि तुला राशि में स्थित हो अर्थात् पंचम भाव में स्थित हो तो मनुष्य का धन चोरों द्वारा नष्ट होता है। तुला में स्थित मंगल पंचम भाव नवमात् नवम भाव अर्थात् भाग्य की हानि करेगा।
8. हिंसात्मक वृत्ति – मिथुन राशि में लग्न में मंगल हो और बुध पर शुभ प्रभाव न हो तो मनुष्य हिंसात्मक (Lover of violence) होता है कारण कि लग्न तथा चतुर्थ, स्वभाव द्योतक घरों पर मंगल का प्रभाव पड़ता है और वह मंगल न केवल स्वयं निसर्गतः हिंसाप्रिय है बल्कि षष्ठेश तथा छठे से छठे घर का स्वामी होने से और भी अधिक हिंसात्मक वृत्ति का प्रतीक बन जाता है । यह वृत्ति और भी हिंसात्मक हो जाएगी यदि केतु छठे स्थान में स्थित हो, क्योंकि केतु भी मंगल ही का प्रभाव रखता है।
यदि छठे स्थान पर केवल शुभ ही शुभ प्रभाव हो, पापी प्रभाव न हो, विशेषतया शुभ लग्नेश का प्रभाव हो तो मनुष्य अपने शत्रुओं से भी प्रीति करने वाला होता है।
9. महान् कष्ट का योग – छठे भाव का स्वामी आठवें हो और निर्बल हो तो अपनी अन्तर्दशा में तथा ऐसे ग्रह की अन्तर्दशा में जो कि द्वितीय, सप्तम, द्वादश अष्टम आदि मारक भावों का स्वामी हो, मृत्यु तुल्य कष्ट देता है । यदि इसकी अन्तर्दशा मृत्यु खंड में आ जाए तो मृत्यु हो जाती है।
इसके अतिरिक्त छटी स्थिति कहीं भी अवांछनीय है क्योंकि यह स्थिति शत्रुता, रोग, अड़चन आदि की द्योतक होती है, अर्थात् जब दशा का स्वामी ग्रह तथा अन्तर्दशा का स्वामी ग्रह कुण्डली में एक दूसरे से छठे आठवें स्थित हों तो वह दशा अन्तर्दशा मनुष्य को अपनी पदवी से हटा देती है अथवा उसका मरण कर देती है भाव यह है कि अपमान तथा अवनति करने वाली होती है । उपर्युक्त स्थिति को षडष्टक कहते हैं ।

षष्ठ भाव में राशियां
1. मेष – मंगल लग्नेश अष्टमेश हो जाता है । इसका फल हम लग्न भाव में विविध राशियों का उल्लेख करते समय कर आये हैं। यदि शनि षष्ठ स्थान में हो तो मंगल में विशेष चोरी की आदत आ जाती है।
2. वृषभ – शुक्र छठे तथा एकादश भाव का स्वामी होता है। दोनों चोट के स्थान हैं। अतः शुक्र और मंगल इस लग्न में जिस भाव, भावेश को अपनी युति अथवा दृष्टि द्वारा प्रभावित करेंगे उसको चोट पहुंचाएंगे। जैसे –
- मंगल तथा शुक्र मिलकर सप्तम स्थान में बैठे हों तो स्त्री के शरीर पर गिरने आदि से चोट पहुंचेगी।
- यदि मंगल तथा शुक्र दोनों अष्टम भाव में स्थित हों और अष्टमेश पर भी प्रभाव डालें तो व्यक्ति की मृत्यु आघात द्वारा होगी, इत्यादि ।
- यदि शुक्र और शनि दोनों अपनी युति अथवा दृष्टि द्वारा किसी भाव, भावेश को प्रभावित करें तो उस भाव द्वारा प्रदर्शित अंग में रोग होगा । जैसे शुक्र तथा शनि पंचम भाव में हों तो पेट में निरन्तर रोग रहें।
- शुक्र बलवान् होने से माता की छोटी बहिनों की संख्या में वृद्धि होती है। परन्तु शुक्र का बलवान् होना धन के लिए विशेष अच्छा नहीं ।
3. मिथुन – बुध षष्ठेश तथा नवमेश बनता है। नवमेश होने से बुध शुभ ही माना जाएगा । यदि बुध बलवान हो तो मामाओं की संख्या में वृद्धि होती है। यदि बुध निर्बल हो तो शत्रुओं द्वारा भाग्य की हानि होती है नौकरी से भी परेशानी होती है।
यदि बुध तथा गुरु दोनों पर मंगल आदि का पाप प्रभाव हो तो बड़े भाई की आयु को कम करता है, क्योंकि षष्ठ भाव एकादश का आयु स्थान है तथा गुरु बड़े भाई का कारक है ।
4. कर्क – षष्ठाधिपति चन्द्र यदि बलवान् हो तो माता की छोटी बहिनों की संख्या को बढ़ाता है। यदि निर्बल हो तो उस संख्या को कम करता है। निर्बल चन्द्र मामा की छाती में रोग उत्पन्न करता है, क्योंकि कर्क राशि छाती की प्रतिनिधि है।
यदि चन्द्र बलवान् तथा शुभ दृष्ट हो तो शत्रुओं से भी सद्व्यवहार करने वाला होता है। यदि चन्द्र अष्टम भाव में हो तो बुरी चेष्टाओं में तथा गम्भीर कार्यों में लगा रहता है।
5. सिंह – सूर्य षष्ठेश यदि बलवान् हो तो मामा को उच्च पदवी दिलाता है, शत्रु बलवान् होते हैं। षष्ठाधिपति निर्बल होकर अष्टम द्वादश आदि स्थानों में स्थित हो तो रोग देता है।
6. कन्या – बुध का सिंह राशि में अथवा वृश्चिक राशि में बैठकर, पापयुक्त, पापट्टष्ट होना और शुभ दृष्टि से रहित होना विपरीत राजयोग को बनाता है जो कि लाखों रुपये देने वाला योग है। बुध निर्बल होने से मामा तथा छोटी बहिन के जीवन को हानि पहुंचाता है।
बुध यदि द्वितीय भाव तथा धनेश से सम्बन्ध करे तो ऋणी बनाता है। बुध का निर्बल होना तथा छठे भाव का पापी ग्रहों द्वारा प्रभावित होना अन्तड़ियों तथा पेट में टाइफाइड एपेन्डीसाइटिस, हर्निया आदि रोगों को उत्पन्न करता है।
7. तुला – यदि शुक्र बलवान् हो तो मामा को लाभ पहुंचाता है अन्यथा हानि । शुक्र को प्रभावित करने वाले ग्रहों से मामा की मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। यदि शुक्र बलवान् हो तो माता की छोटी बहिनों की संख्या अधिक होगी अन्यथा कम । शुक्र शुभ दृष्ट हो तो शत्रु से भी सद्व्यवहार करने वाला होता है।
8. वृश्चिक – मंगल षष्ठाधिपति तथा एकादशाधिपति बन जाता है। एक तो मंगल हिंसाप्रिय है, फिर हिंसा स्थान (छठे) का स्वामी है, पुनश्च एकादश स्थान भी छठे से छठा होने के कारण हिंसात्मक ही है; अतः मंगल में बहुत हिंसा का समावेश हो जाता है। यदि केतु भी षष्ठ अथवा एकादश स्थान में पड़ा हो तो मंगल उग्रतम रूप में हिंसात्मक बन जाता है।
स्पष्ट है कि जितना-जितना अधिक इस मंगल का प्रभाव लग्नादि पर पड़ेगा, मनुष्य उतना उतना अधिक हिंसाप्रिय होता चला जाएगा। यदि ऐसा मंगल लग्न में (मिथुन राशि में) हो और चन्द्र पर मंगल की दृष्टि हो तो मनुष्य घातक (Murderer), लुटेरा आदि होता है।
9. धनु – गुरु नवमेश होने के कारण अन्ततोगत्वा शुभ ही रहता है, यद्यपि कोई विशेष शुभदायक नहीं होता। बलवान् गुरु मामाओं की संख्या को बढ़ाता है, यदि गुरु निर्बल हो तो भाग्य में हानि किसी ब्राह्मण शत्रु द्वारा होती है ।
10. मकर – शनि का बलवान होना धन के लिए अच्छा नहीं है। शनि अष्टम में अथवा द्वितीय में बहुत कष्टप्रद होता है। यदि शनि बलवान् हो तो मामा की छोटी बहिनों की संख्या अधिक होती है ।
11. कुम्भ – यदि राहु भी छठे स्थान में हो तो शनि मनुष्य को दीर्घ रोगी बना देता है, विशेषतया यदि बुध भी निर्बल हो। ऐसी स्थिति में रोग प्रायः प्रिया के शाप का फल होता है जब कि उसका प्रेम ठुकराया जाए । पंचम प्रिया का स्थान है, अतः षष्ठेश शनि प्रिया का शाप है ।
12. मीन – गुरु का निर्बल होना अभीष्ट है, क्योंकि गुरु दो अशुभ भावों – तृतीय तथा षष्ठ का स्वामी होता है । बलवान् गुरु छोटे भाई तथा मामा को सुख देता है, परन्तु धनाधिपति लाभाधिपति से सम्बन्ध करने पर धन में कमी तथा ऋण की उत्पत्ति करता है ।
फलित सूत्र
- ज्योतिष के कुछ विशेष नियम
- ग्रह परिचय
- कुंडली के पहले भाव का महत्व
- कुंडली के दूसरे भाव का महत्व
- कुंडली के तीसरे भाव का महत्व
- कुंडली के चौथे भाव का महत्व
- कुंडली के पॉचवें भाव का महत्व
- कुंडली के छठे भाव का महत्व
- कुंडली के सातवें भाव का महत्व
- कुंडली के आठवें भाव का महत्व
- कुंडली के नौवें भाव का महत्व
- कुंडली के दसवें भाव का महत्व
- कुंडली के ग्यारहवें भाव का महत्व
- कुंडली के बरहवें भाव का महत्व
- दशाफल कहने के नियम
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